राजा बलवंत सिंह
Anuj Singh
अवागढ़ से अलीगढ़ तक — शौर्य, स्वाभिमान और संगठन की गाथा
अवागढ़ की माटी बोले,
किसका गौरव, किसकी शान?
जादौन कुल की आन पुकारे—
बलवंत सिंह महान!
जिसके माथे तिलक शौर्य का,
जिसके हृदय में मान,
जिसके नाम से गर्वित होता
पूरा क्षत्रिय खानदान।
न मुकुटों का मोह रहा था,
न सिंहासन का अभिमान,
प्रजा रहे सुख-शांति से—
यही रहा उनका अरमान।
वीर वही जो रण में जीते,
वीर वही जो मान बचाए,
वीर वही जो अपनी धरती
पर संकट में शीश चढ़ाए।**
जादौन कुल की रक्तधारा में
वीरों की पहचान थी,
बलवंत सिंह के जीवन में
उस गौरव की शान थी।
रग-रग में राजपूती ज्वाला,
आँखों में स्वाभिमान था,
माटी के सम्मान से बढ़कर
न कोई दूसरा मान था।**
पर वीरता केवल तलवारों
की चमक दिखलाना नहीं,
वीरता केवल रणभूमि में
शत्रु को हराना नहीं।
वीर वही जो समाज उठाए,
वीर वही जो राह बनाए,
बिखरे हुए समाज को लेकर
एक ध्वज के नीचे लाए।
जब क्षत्रिय समाज के आगे
संगठन की बात आई,
बलवंत सिंह ने बढ़कर अपनी
जिम्मेदारी निभाई।
एक विचार, एक आवाज़,
एक ध्वज और एक निशान,
संगठित हो उठे क्षत्रिय—
बढ़ा समाज का मान।**
उन्नीस सौ नहीं—
वो उन्नीसवीं सदी का समय था,
जब संगठन का दीप जलाना
अपने आप में एक प्रण था।
उमराव सिंह साथ खड़े थे,
उदय प्रताप भी साथ थे,
तीन वीरों के संकल्पों में
भविष्य के जज़्बात थे।
अवागढ़ से उठी पुकार,
कोटला ने स्वर मिलाया,
भिनगा ने भी हाथ बढ़ाया,
एक नया अध्याय बनाया।
नारा था—संगठन का,
संकल्प था सम्मान का,
स्वप्न था शिक्षा, उन्नति का,
गौरव था क्षत्रिय नाम का।
और फिर इतिहास ने देखा
वो अद्भुत अभियान—
जिसमें बलवंत सिंह बने
समाज की बुलंद जुबान।
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अब सुनो (अलीगढ़) की धरती,
जिसका रिश्ता उनसे खास,
आज भी जिनके नाम से जुड़ता
इस धरती का इतिहास।
बौनेर की राहें कहती हैं—
“हमने उनको याद रखा,”
अलीगढ़ ने अपने दिल में
उनका सम्मान सदा रखा।
जिस राह से गुजरें मुसाफिर,
जिस राह से गुजरे कारवाँ,
वहीं गवाही देता है अब
उनके नाम का सम्मान।
अलीगढ़ से अवागढ़ तक,
गूँजे एक ही तान—
राजा बलवंत सिंह अमर रहें,
अमर रहे उनका नाम!
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पर उनकी सबसे बड़ी विरासत
केवल राजमहल नहीं था,
उनका सपना केवल अपना
व्यक्तिगत वैभव नहीं था।
उन्होंने समझा—
जिस समाज के हाथ में शिक्षा है,
उसके हाथ में शक्ति है,
जिस युवा के मन में ज्ञान है,
उसके हाथ में भक्ति है।**
इसलिए शिक्षा की ज्योति जलाई,
ज्ञान की राह दिखाई,
आने वाली पीढ़ी के लिए
नई दिशा बनवाई।
तलवारें जंग खा सकती हैं,
महल धूल में मिल सकते हैं,
पर शिक्षा के दीपक से
सदियों के अँधियारे खिल सकते हैं।
यही सोच थी, यही पुकार थी,
यही उनका सम्मान था,
इसीलिए तो आज भी जीवित
उनका नाम महान था।
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तो मत पूछो कौन थे वो—
इतिहास स्वयं बतलाएगा,
अवागढ़ का कण-कण उनका
गौरव गीत सुनाएगा।
अलीगढ़ की राहें बोलेंगी,
जादौन कुल अभिमान करेगा,
क्षत्रिय समाज का हर युवा
उनका गुणगान करेगा।
जब तक सूरज चमकेगा,
जब तक चाँद रहेगा,
बलवंत सिंह का नाम
सदा आबाद रहेगा।**
जब तक वीरों की गाथा में
शौर्य लिखा जाएगा,
जब तक स्वाभिमान का दीपक
भारत में जलता जाएगा—
तब तक अवागढ़ बोलेगा—
ये मेरी आन है!
अलीगढ़ बोलेगा— ये मेरा सम्मान है!
जादौन बोलेगा—ये मेरी शान है!
और क्षत्रिय समाज बोलेगा—राजा बलवंत सिंह
हमारी पहचान हैं!
मुकुट बहुत आए,
मुकुट बहुत जाएँगे,
सिंहासन बहुत सजेंगे,
सिंहासन बहुत ढह जाएँगे।
पर जो इतिहास के हृदय में
अपना नाम लिखाते हैं,
वो राजा नहीं कहलाते केवल—
वो युग बन जाते हैं!
तो हाथ उठाओ, स्वर मिलाओ,
आज यही उद्घोष करो—
अवागढ़ की आन रहे!
अलीगढ़ का मान रहे!
जादौन कुल की शान रहे!
क्षत्रिय का स्वाभिमान रहे!**
और जब तक धरती पर
वीरता की पहचान रहे—
तब तक अमर रहे नाम—
राजा बलवंत सिंह महान!
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